दिशाएँ  एवं क्षेत्र :- 
सूर्य जिस दिशामें उदय होता हैउसदिशा को पूर्व दिशा कहते हैं  एवं जिस दिशा में सूर्य अस्त होता है उस दिशा को पश्चिम दिशा कहते हैं , जब कोई पूर्व  दिशा की ओर मुहँ करके खड़ा होता है , उसके बांयी ओर  उत्तर दिशा  एवं दांयी ओर दक्षिण दिशा होती है | वह कोण जहाँ दोनों दिशाएँ मिलती हैं  वह स्थान अधिक महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वह स्थान दोनों  दिशाओं से आने वाली शक्तियों को मिलाता है | उत्तर – पूर्वी कोने को ईशान , दक्षिण- पूर्वी  कोने को  आग्नेय , दक्षिण – पश्चिम  कोने को नैरत्य , और उत्तर – पश्चिम कोने को वायव्य  कहते हैं | दिशाओं का महत्व निम्न प्रकार से है :-
पूर्व :  पित्रस्थान , इस दिशा में कोई कोई रोक या रुकावट  नहीं होनी चाहिए , क्योंकि यह नर- शिशुओं
            व् संतति का स्त्रोत है |
दक्षिण – पूर्व (आग्नेय) :  यह स्वास्थ्य का स्त्रोत है ,  यहाँ  अग्नि का वास  रसोई आदि का कार्य करना
                                               चाहिए |
दक्षिण : सुख , सम्पन्नता  और फसलों का स्त्रोत है
दक्षिण – पश्चिम ( नैरत्य) :  व्यवहार और चरित्र का स्त्रोत है  तथा दीर्घ जीवन एवं मृत्यु का कारण  |
पश्चिम :  नाम , यश,  और सम्पन्नता  का स्त्रोत है |
उत्तर – पश्चिम (वायव्य) :व्यापार , मित्रता, और शत्रुता में परिवर्तन का स्त्रोत |
उत्तर :  माँ का स्थान , यह कन्या शिशुओं का स्त्रोत है , अतः इसमें कोई रूकावट नहीं होनी चाहिये |
उत्तर – पूर्व (ईशान) :  स्वास्थ्य , संपत्ति , नर- शिशुओं , और सम्पन्नता का स्त्रोत है |
पूर्व मुखी भूखंड शिक्षा एवं पत्रकारिता  तथा फिलोस्फर जैसे लोगों के लिए उपयुक्त रहते हैं  तथा  हवा 
व् प्रकाश के लिए भी अच्छे रहते हैं | उत्तर मुखी भूखंड सरकारी  कर्मचारी , प्रशासन से सम्बंधित  कार्यों
व् सेना के लोगों के लिए ज्यादा अच्छे रहते हैं | दक्षिण मुखी भूखंड ब्यापारिक प्रतिष्ठानों  एवं व्यापार
के कार्यों  तथा धन के लिए अच्छे रहते हैं | पश्चिम मुखी भूखंड सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए ज्यादा 
अच्छे रहते हैं |
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