मित्र राशियाँ व् शत्रु राशियाँ
मित्र राशियाँ :  जब ग्रह अपनी किसी मित्र राशी को ग्रहण करते हैं | उस स्थिति में ग्रह अपने आप को परिणाम देने में अत्यधिक स्वतंत्र व् समर्थ पाते हैं , परन्तु ग्रह प्रबल अवस्था में होने चाहिए | सूर्य ,चन्द्र ,मंगल मित्र गृह हैं तथा गुरु उसका सम है | शनि , बुध , राहू तथा केतु मित्र ग्रह हैं तथा शुक्र शुक्र उनका सम है |
शत्रु राशियाँ :  जब ग्रह अपनी किसी शत्रु राशी को ग्रहण करते हैं | तब ऐसी स्थिति में ग्रह अपने आप को अपनी सामर्थ्यानुसार फल देने में कठिनाई अनुभव करते हैं | परन्तु यदि कोई ग्रह अपनी शत्रु राशी में स्थित होकर अपनी मूल त्रिकोण राशी पर दृष्टी डालता है तो ऐसी अवस्था में यह नियम लागू नहीं होता है तथा ग्रह फल देने में अपने आप को सीमित नहीं करते हैं | विभिन्न ग्रहों की मूल त्रिकोण राशियां निम्न रूप से हैं :
ग्रह                         मूल त्रिकोण राशी
सूर्य                         सिंह
चन्द्र                       कर्क
मंगल                      मेष
बुध                          कन्या
गुरु                         धनु
शुक्र                        तुला
शनि                       कुम्भ
ग्रहों की स्थिति की गणना हम ज्योतिर्विज्ञान के नियमों की सहायता से करते हैं |
भावों की प्रकृति  : केंद्र तथा त्रिकोण शुभ भाव है | दुस्थान अशुभ भाव है तथा तटस्थ भावों पर भी शुभ भाव जैसा ही विचार करना चाहिए | तटस्थ भाव अपने योगदान से आश्चर्य जनक व् सकारात्मक परिणाम प्रदान करते हैं | लग्न से षष्ठ या छटवें,आठवें तथा बारहवें भाव में अशुभ कहलाते हैं |इन भावों के अतिरिक्त अन्य सभी भाव शुभ भाव कहलाते हैं |
लग्न                          क्रियात्मक अशुभ ग्रह
मेष                              बुध
वृषभ                          मंगल, शुक्र, एवं  गुरु 
मिथुन                       कोई भी नहीं
कर्क                          गुरु और शनि
सिंह                           चन्द्रमा
कन्या                       सूर्य, शनि, एवं मंगल
वृश्चिक                     शुक्र एवं मंगल
धनु                          चन्द्रमा
मकर                       सूर्य एवं गुरु
कुम्भ                       चन्द्र एवं बुध
मीन                         सूर्य , शुक्र एवं शनि     
 

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