प्राणायाम क्या है  एवं प्राणायाम  तथा प्राण का क्या सम्बन्ध है ?

प्राणायाम करने वाली एक नासिका में दो छिद्रों का महत्त्व एवं प्राणायाम तथा प्राण का सम्बन्ध  |

प्राण यानि शरीर को चलाने वाली शक्ति | प्राण यानि फोर्स आफ लाइफ | प्राण से ही सब कुछ है और प्राण योग से प्रदीप्त होता | प्राण को श्वास मान लेने की गलती कभी नहीं करनी चाहिए | लेकिन श्वास के आश्रय से ही प्राण भी है | प्राण के लिए श्वास जरूरी है और इसी श्वास को संतुलित तरह से लेकर प्राणायाम किया जाता है |  प्राण +आयाम , यानि प्राणों का दायरा बढ़ने का कार्य |

एक प्रकार से श्वास लेना और छोड़ना प्राण की बाह्य अभिव्यक्ति है | श्वास लेने के लिए नाशिका के दो छिद्र दिए गए हैं | योग से दोनों छिद्र खुलकर श्वास भीतर ले जा सकते हैं | इसके बाद ही मेरुदंड से लगी सुषुम्ना नाडी में प्राण का उद्भव होता है | आपकी कौन सी नासिका से ली गयी श्वास शरीर को निम्न प्रकार से प्रभावित करती है  :-

नाक का बायाँ  हिस्सा  : – 

मेडिकल साइंस के अनुसार :- मेडिकल साइंस के अनुसार  डर भी लगेगा  व् क्रोध  भी आयेगा | इसी नर्व के कारन लार कम बनती है , म्यूकस घटता है | आँतों में गतिशीलता मंद होती है | लीवर में ग्लायकोजन से ग्लूकोज बनाने का काम इसी का है , इसके कारन यूरिन सिक्रिशन प्रभावित होता है | धडकनें तेज हैं तो नाक के इस हिस्से को काबू करने से वे धीमी पड़ जायेगी |

आयुर्वेद के अनुसार :-

आयुर्वेद के अनुसार यह चन्द्र नाडी है | चन्द्र यानि शीतलता का प्रतीक | शीतलता यानि जिसका सम्बन्ध कफ से होता है | इस नासाछिद्र के मध्यम से ही बढे हुये ब्लड प्रेशर पर नियंत्रण किया जा सकता है | चन्द्र नाडी होने के साथ  –  साथ यह मन पर काम करने वाली नाडी मानी जाती है |

ये शरीर को ठंडा करती है , इसमें ध्यान यह रखना होता है कि यदि यह अधिक सक्रिय हुयी तो शारीरिक मंदता आ जाती है | डिप्रेशन के लिए यह अधिक जिम्मेदार है | क्रोध, आलस इसके असंतुलन के कारण ही होता है |

योग शास्त्र के अनुसार :-

योग शास्त्र के अनुसार शरीर के इस भाग को इडा नाडी  कहतें हैं | इडा यानि काली | जो स्वरुप काली के हैं, वही कार्य इस नाडी के भी हैं | चरम वात्सल्य और तीव्र उद्वेग | योग में प्रत्येक अभ्यास पहले बायीं ओर से करने का नियम है, क्योंकि  पहले मन को साधोगे तभी बुद्धि सधेगी | इस नाडी के असर व् सक्रिय होने से लोग भावावेश में रहते हैं | ऐसे लोगों को रोना जल्दी आ जाता है  और जल्दी ही वे लोग खिलखिलाने भी लगते हैं | मगर मन में उथल पुथल चलती रहती है | पहले शरीर के बांयें छिद्र से प्राणायाम करते हैं क्योंकि यह नाडी शांति से बैठने नहीं देती है, इसलिए पहले शरीर के बांये भाग को आसन, प्राणायाम से साधते हैं | यदि इसे काबू नहीं किया तो ध्यान संभव नहीं | ठीक वैसे ही जैसे कि भारी जुकाम कुछ भी करने नहीं देगा |

आसन के अनुसार :-

आसन जो इसे सक्रिय कर देते हैं | शरीर के बांये भाग को सक्रिय करने वाले प्रमुख आसनों में सूर्य नमस्कार है | यदि ये भाग शिथिल है तो धनुरासन, उष्ट्रासन , चक्रासन इसे सक्रिय कर देते हैं | यांनी छाती पर प्रभाव डालने वाले जितने भी आसन हैं वे इसको खोल सकते हैं , क्योंकि इं सभी आसनों में अतिरिक्त रूप से श्वास रोकनी होती है | उपरोक्त आसनों में दोनों हाथों और कन्धों का प्रयोग होता है | इससे कन्धों से मष्तिष्क तक दोनों ओर से जाने वाली कैरोटीड  आर्टरी खुलती है और दोनों ही नासा छिद्र खुल जाते हैं | एवं जिन लोगों की बांयी नाक बंद होती है वो भी खुल जाती है | जिन लोंगों को कफ की शिकायत रहती है उन लोगों की यह नाडी अधिक देर तक सक्रिय रहती है अतः उन लोगों को शरीर को ठंडा करने वाले शीतली और शीतकारी प्राणायाम नहीं करने चाहिए |

इडा नाडी या बांयें  छिद्र  के अधिक चलने या सक्रिय रहने वाले  लोगों का स्वभाव :-  इडा नाडी या बांयें  छिद्र  के अधिक चलने या सक्रिय रहने वाले लोग अंतरमुखी होते हैं | यह नाडी यदि एक या डेढ़ घंटे से ज्यादा समय तक चल रही है तो समझ लेना चाहिए की शरीर में कहीं गड़बड़ हो रही है | बायीं  नासिका से ली जाने वाली श्वास मष्तिष्क में दाहिने भाग को प्रभावित करती है | ऐसे लोग भावनात्मक  होते हैं वे बहुत जल्द ग्लानि महसूस करते हैं और वे किसी के भी द्वारा आसानी से दबाये जा सकते हैं |

नाक का दायाँ हिस्सा  :-

मेडिकल साइंस के अनुसार :- मेडिकल साइंस के अनुसार यह हिस्सा यानी दांयाँ नासिका छिद्र  पाचन व् आराम  का कार्य करता है | चूँकि यह पाचन का कार्य करती है इसलिए सलाइवा भ इससे बढ़ता है | इसी से खाना पचाने के लिए पाचक रस निकलते हैं यानी इसी से यूरिन का सीक्रिशन बढ़ता है | ब्लड प्रेशर घटाने की दवा , इसी नर्व पर लागू होकर वह यूरिन सीक्रिशन बढ़ाती है |

आयुर्वेद के अनुसार :- आयुर्वेद के अनुसार इसे सूर्य नाडी कहते हैं | सूर्य यानी शरीर में गर्मी बढ़ने का कार्य इसके जिम्मे रहता है | इसलिए ये खाना पचाने का कार्य भी करता है | खाना पचाना यानि हाइड्रोक्लोरिक  एसिड बनाने का कार्य | इस लिहाज से यह नाडी शरीर को संतुलित मात्रा  में पित्त देने का भी कार्य करती है | इस नाडी की  गड़बड़ी के कारण शरीर में एसिडिटी की शिकायत होती है | इस नाडी की सक्रियता से आप काम को सही तरह से कर सकेंगे , जिस प्रकार बायीं नाडी मूत्र विसर्जन के लिए जिम्मेदार है उसी प्रकार यदि यह नाडी चल रही है और आप शौच विसर्जन के जाते हैं तो पेट साफ अच्छे से होगा अन्यथा नहीं |

योग शास्त्र के अनुसार :-

योग शास्त्र के अनुसार शरीर के इस भाग को पिंगला नाडी कहते हैं | यह गर्म नाडी है, शरीर में गर्मी का काम इसी के जिम्मे रहता है | यही शरीर में खाना पचाने का भ काम करती है | स्वर योग के अनुसार स्वस्थ  ब्यक्ति की सुबह १०:३० बजे यह नाडी खुलती है |  यानी सुबह १०:३० बजे ये नासाछिद्र चलने लगता है उस वक्त जो भी खाया हो वह पच जाएगा |  इस नासिका छिद्र के सक्रिय होने पर कई प्रकार के पाचक रस निकलते हैं | इसके चालु रहने पर अन्न को पचाने की ताकत मिलती है | इसलिए भोजन के पश्चात बायीं करवट लेकर लेटने को कहते हैं , जिससे बायाँ बगल दबेगा और सूर्य नाडी चालू होकर खाना पचा देगी |

इसके बिना ध्यान करना असंभव होता है | श्यान करने के लिए इसी नासिका का खुला होना सबसे ज्यादा जरूरी है | अन्यथा ध्यान लग पाना संभव नहीं है | क्योंकि अगर यह नासाछिद्र बंद है तो आप भावनाओं के भवंर में ही फंसे रहोगे , एकाग्र होकर ध्यान नहीं कर सकेंगे | इस नाडी के चलने से ही ध्यान की लय बन  पाती है |

आसन के अनुसार :-

आसनों के द्वारा इस नाडी की अत्यधिक सक्रियता को कम कर सकते हैं | इस ओर की नासिका यदि निष्क्रिय है तो मनुष्य को भूख ही नहीं लगेगी | इसकी सक्रियता के लिए भी सूर्य नमस्कार बेहद आवश्यक है | लेकिन समस्या इसकी  अत्यधिक सक्रियता के कारण होती है | इसे शांत करने के लिए शशकासन , भ्रामरी , शीतकारी प्राणायाम हैं |

जिनकी ये नाडी अत्यधिक सक्रिय है उनको धनुराशन , उष्टासन , सूर्य नमस्कार , भुजंगासन नहीं करना चाहिए | ऐसे लोगों को उज्जायी , कपालभांति और ब भस्त्रिका प्राणायाम भी नहीं करना चाहिए | जिन लोगों में इस नाडी की अधिक सक्रियता है उन्हें योग निद्रा का आसन करना चाहिए |योग निद्रा से मनोवैज्ञानिक रूप से विश्रांति आती है | अहंकार शिथिल होता है | योगनिद्रा इस तरह के व्यक्तित्व को बदलती है |

पिंगला नाडी के अधिक चलने पर साधक का स्वभाव :-  जिन लोगों की दायीं  नासिका यानि पिंगला नाडी  अधिक सक्रिय होती है वे लोग बहिर्मुखी होते हैं | दांयीं नासिका से श्वास – प्रश्वास अधिक होने लगता है | यदि  यह लम्बे समय तक चलती रही तो प्राणिक स्तर पर बदलाव दिखने लगता है | यह नाडी मस्तिष्क के बाएं गोलार्द्ध को नियंत्रित करती है | ऐसे लोगों में अहंकार अधिक होता है | कई बार ऐसे लोग अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझते |

प्राण क्या है ?

सबसे बड़ी बात यह है की दोनों ही नासा छिद्र एक साथ नहीं चलते है | मात्र संधिकाल में ही एक साथ चलते हैं | यदि दाहिना नासाछिद्र बंद है तो बायाँ चालू रहेगा और बायाँ बंद है तो दाहिना चालू रहेगा | योग की वजह से दोनों नासाछिद्र खुलते हैं और दोनों से श्वास को भीतर ले जा सकते हैं |जो जीवनदायी प्राण को तैयार करता है | शरीर पञ्च महाभूत ( पृथ्वी , अग्नि, जल, वायु, आकाश, ) से बना है | उसी प्रकार प्राण भी पांच प्रकार के हैं एवं पांच उपप्राण भी हैं  जैसे  छींक, डकार, जम्हाई, हिचकी, व् खुजली | १. प्राण २. अपान  ३. समान  ४. उदान  ५. व्यान ,  इनके पांच उप प्राण भी हैं  –  नाग, कूर्म, क्रकल , देवदत्त और धनञ्जय |

प्राण :-  नासिका से लेकर ह्रदय तक का भाग प्राण होता है | आँखें , कान, मुख, इसी प्राण से काम करते हैं | यह सभी प्राणों का रजा है | राजा के समान यह अन्य प्राणों को विभिन कार्य सोंपता है |
अपान :- अपान शरीर के निचले स्थान की वायु है यानी गन्दी वायु है | नाभि से लेकर पैर तक का हिस्से  में अपान रहता है |
समान :-  समान ह्रदय से लेकर नाभि के बीच में होता है | अन्न पचाने का काम समान करता है | इसी से अन्न से रस, रक्त और धातु बनते हैं |
उदान :- उदान कंठ से लेकर मस्तिष्क तक रहता है , इसी से शब्द बोले जाते हैं एवं  वमन भी यही करता है |
व्यान :-  व्यान पूरे शरीर में होता है |रक्त संचरण और प्राणों के आवागमन का कार्य इसी का है

प्राण हमारे शरीर में पांच स्थानों पर जीवन भर रहता है एवं ये प्राणायाम के तरीकों से बनता एवं जाग्रत रहता है | प्राण से शरीर की जीवन अवधि बढ़ती है तथा एक एक कोशिका को नया जीवन मिलता है | दर असल हम सामान्य लोग एक मिनट में दस से पंद्रह श्वास तक लेते हैं , इसे कम करते हुये एक मिनट में एक श्वास लेना चाहिए |

प्राण के प्रभाव :-  प्राण के दो महत्वपूर्ण प्रभाव हमारे  शरीर पर दिखते हैं , जैसे गर्मी लगना  एवं दूसरा ठंडी लगना | इसीलिए कुछ प्राणायाम शरीर में पसीना ला देते हैं  एवं कुछ में ठंडक लगती है |

गर्मी देने वाले प्रभाव :-  कपालभांति , भस्त्रिका प्राणायाम , सूर्या भेदी ऐसे प्राणायाम हैं जो शरीर में गर्मी उत्पन्न करतें हैं | भस्त्रिका प्राणायाम  और कपाल भांति में तो पेट तेजी से अन्दर बाहर  होता है  | इसलिए इन प्राणायामों में समान प्राण सक्रिय होता है |

ठंडक देने वाले प्रभाव –   शीतली , शीतकारी , ऐसे प्राणायाम हैं , जिनसे ठंडक बढती है | ये वक्ष स्थल  पर कार्य करते हैं | यहाँ प्राण का ही वास रहता है जो कभी भी उत्तेजित नहीं होता है | इससे ब्लड प्रेशर लो होता है एवं यूरिन इन्फेक्शन  दूर होता है |

सभी प्राणों का मिलना  – सभी प्राण कुम्भक  यानी श्वास को जब भीतर और बाहर रोका जाता है तो पेट और ह्रदय के पास प्राण , अपान और समान तीनों एक होते हैं | तीनों के एक होने पर ही ऊर्जा और आनंद का अनुभव होता है |
मेरुदंड या रीढ़ की हड्डी  को मेडिकल साइंस शरीर का पॉवर हाउस मानता है यह कई नस नादियों को मस्तिष्क से जोड़ता है |
योग से जब दोनों नासाछिद्र खुल जाते हैं तभी प्राण मेरुदंड से लगी सुषुम्ना नाडी में प्रवेश करते हैं और प्राण जाग्रत हो जाते हैं |

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